Unmukt

क्या वर्तमान सरकार चाणक्य की नीति पर चल रही है? – एक विश्लेषण

भारत की शासन-व्यवस्था के मूल्यांकन में यदि किसी प्राचीन विचारक का दृष्टिकोण सबसे अधिक प्रासंगिक माना जाता है, तो वह हैं आचार्य चाणक्य (कौटिल्य)। उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ में एक आदर्श राजा व शासन के गुण बताए थे – न्यायप्रियता, जनकल्याण, पारदर्शिता, सुरक्षा, परामर्श से निर्णय और आत्म-नियंत्रण। इस आलेख में हम देखेंगे कि क्या वर्तमान भारतीय सरकार इन सिद्धांतों पर खरी उतरती है और क्या वह एक संवेदनशील सरकार के मानकों को पूरा करती है।

1. राष्ट्र की सुरक्षा और आक्रामकता से रक्षा: चाणक्य का मूल सिद्धांत

चाणक्य के अनुसार, शत्रुओं के प्रति कठोरता और जनता की सुरक्षा में कोई समझौता नहीं होना चाहिए। वर्तमान सरकार ने आतंकी हमलों (पुलवामा, उरी) के जवाब में सर्जिकल और एयर स्ट्राइक कर स्पष्ट संकेत दिया कि वह सुरक्षा के मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी। चीन के विरुद्ध एलएसी पर भारत की स्थिति और आत्मनिर्भर रक्षा नीति (Make in India in Defence) इस दर्शन के अनुरूप है।

निष्कर्ष: सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में चाणक्य के विचारों के काफी निकट है।

2. परामर्श और आलोचना के प्रति संवेदनशीलता

चाणक्य कहते हैं – एक राजा को अपने मंत्रियों की बात सुननी चाहिए और अहंकार से बचना चाहिए। आलोचना से सीखकर ही कोई शासन मजबूत बनता है।

हालांकि, कुछ आलोचनाएं यह दर्शाती हैं कि सरकार आलोचना के प्रति कम सहिष्णु है – जैसे कुछ मीडिया हाउसों, एनजीओ या विपक्षी नेताओं पर कार्यवाही। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्यवाहियाँ उचित थीं?

उदाहरण: NewsClick पर चीनी फंडिंग के आरोपों के बाद की गई कार्रवाई, यदि राष्ट्रविरोधी कृत्यों के खिलाफ है, तो यह राष्ट्रीय हित में है। लेकिन आलोचना इस बात पर थी कि कार्रवाई कैसे की गई – क्या पारदर्शिता थी, और क्या मीडिया की स्वतंत्रता पर इसका असर पड़ा?

निष्कर्ष: आलोचना का दमन नहीं, बल्कि विधि सम्मत पारदर्शिता बनाना एक संवेदनशील शासन का गुण है। इसमें सुधार की आवश्यकता है, लेकिन नीयत पर सीधा प्रश्न उचित नहीं।

3. सामाजिक समावेशिता और न्याय

चाणक्य ने सभी समुदायों के प्रति न्याय की बात कही थी। CAA जैसे कानूनों को लेकर विपक्ष ने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का मुद्दा उठाया, हालांकि यह कानून भारत में पहले से रह रहे अल्पसंख्यकों के विरुद्ध नहीं था, बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से उत्पीड़न के कारण आए हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध शरणार्थियों को नागरिकता देने का कानून था।

निष्कर्ष: सामाजिक ध्रुवीकरण की आशंका राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही, परन्तु यदि नीतियों का उद्देश्य स्पष्ट और राष्ट्रहित में है, तो संवेदनशीलता का सही आकलन इस बात पर होना चाहिए कि वह नीति समाज को सुरक्षित और न्यायोचित दिशा में ले जाती है या नहीं।

4. संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता

चाणक्य का मत था कि न्यायपालिका और संस्थाएं राजा को जवाबदेह रखें। भारत में न्यायपालिका की नियुक्ति प्रक्रिया (कोलेजियम सिस्टम) सरकार से स्वतंत्र है।

हालाँकि कुछ आलोचकों ने चुनाव आयोग या जाँच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, लेकिन यह भी सच है कि पहली बार चुनाव आयोग की नियुक्ति की प्रक्रिया को संसद के माध्यम से विधिक आधार मिला है – जिसमें विपक्षी सदस्य भी सम्मिलित होते हैं।

निष्कर्ष: आलोचना के बावजूद, संस्थागत प्रक्रिया में सुधार हुए हैं। वास्तविक स्वतंत्रता का मूल्यांकन समय के साथ हो सकता है।

5. पारदर्शिता और जवाबदेही

चाणक्य ने स्पष्ट लिखा है कि जनता के धन का दुरुपयोग या अपारदर्शिता शासन के पतन का कारण बनती है। चुनावी बांड प्रणाली और RTI में संशोधन को लेकर कुछ चिंताएं रही हैं – जैसे किस पार्टी को किससे फंडिंग मिली, यह जानकारी क्यों नहीं मिलती।

निष्कर्ष: जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी पर सरकार को और खुलापन दिखाना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक विश्वास बना रहे।

निष्कर्ष: क्या वर्तमान सरकार चाणक्य के आदर्शों पर चल रही है?

यदि हम चाणक्य के सिद्धांतों की कसौटी पर परखें, तो भारत की वर्तमान सरकार कई मामलों में उनके दर्शन के अनुरूप कार्य कर रही है:

राष्ट्रीय सुरक्षा
आत्मनिर्भरता
जनहित में योजनाएं (जनधन, आयुष्मान, डिजिटल इंडिया)
सीमाओं पर आक्रामक नीति

जहाँ चुनौतियाँ हैं:
पारदर्शिता में संतुलन
आलोचना के प्रति प्रतिक्रिया की विधि
संवैधानिक संस्थाओं की सार्वजनिक छवि

विचार:
एक संवेदनशील और चाणक्यनिष्ठ सरकार केवल नीतियों से नहीं, बल्कि उनके कार्यान्वयन में दिखने वाली न्यायप्रियता, सहिष्णुता और पारदर्शिता से बनती है। वर्तमान सरकार ने अनेक बिंदुओं पर चाणक्य की नीति को साकार किया है, पर कुछ पहलुओं पर और संवेदनशील दृष्टिकोण की आवश्यकता बनी हुई है।

Comments

Leave a comment