Unmukt

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण: वित्तीय नियंत्रण, समावेश और शासन की चुनौतियां

15 मई 2025 को, जब हम भारत की आर्थिक नीतियों पर विचार करते हैं, तो 1969 में श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा 14 प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण का निर्णय एक ऐतिहासिक कदम था। इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत में बैंकिंग पहुंच बढ़ाना और कृषि जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देना था। लेकिन क्या यह नीति केवल वित्तीय समावेश के लिए थी, या यह नागरिकों पर वित्तीय नियंत्रण का साधन भी बनी? यह लेख अर्थशास्त्रियों के दृष्टिकोण, ग्रामीण भारत पर प्रभाव, और 2014 में शुरू हुई जन धन योजना की आवश्यकता का विश्लेषण करता है, साथ ही एक सरकारी कंपनी में कंपनी सेक्रेटरी की भूमिका पर प्रकाश डालता है।

राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य और ग्रामीण भारत पर प्रभाव

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण सामाजिक समानता को बढ़ावा देने का एक प्रयास था। उस समय, केवल 17% बैंक शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में थीं। राष्ट्रीयकरण के बाद, 1980 तक यह संख्या 15,000 से अधिक हो गई। ग्रामीण जमा का हिस्सा 1969 में 3% से बढ़कर 1985 तक 15% हो गया, और कृषि को ऋण 2% से 10% तक पहुंचा। इससे किसानों को साहूकारों से मुक्ति मिली और हरित क्रांति को समर्थन मिला।

हालांकि, इस नीति की कमियां भी थीं। ग्रामीण शाखाएं अक्सर लाभहीन रहीं, और राजनीतिक हस्तक्षेप ने ऋण वितरण को प्रभावित किया। कई बार, ऋण उन लोगों को मिले जो सत्ताधारी पार्टी के करीबी थे, जिससे वास्तविक जरूरतमंद प्रभावित हुए। वित्तीय साक्षरता की कमी के कारण कई खाते निष्क्रिय रहे, जिसने नीति के प्रभाव को सीमित किया।

अर्थशास्त्रियों का दृष्टिकोण: वित्तीय नियंत्रण का साधन?

कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि राष्ट्रीयकरण ने सरकार को वित्तीय नियंत्रण का एक साधन दिया। नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने आर्थिक स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कहा कि ऐसी नीतियां व्यक्तिगत स्वायत्तता को सीमित कर सकती हैं। जगदीश भगवती ने इसे “लाइसेंस-परमिट राज” का हिस्सा बताया, जहां बैंक राजनीतिक संरक्षण के साधन बन गए। 1975-77 के आपातकाल के दौरान, सरकार ने बैंकों का उपयोग विरोधियों के खातों को फ्रीज करने के लिए किया, जो नियंत्रण का स्पष्ट उदाहरण है।

पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने नोट किया कि राज्य-नियंत्रित बैंक लेनदेन की निगरानी को सक्षम बनाते हैं। 2025 तक, डिजिटल बैंकिंग और KYC नियमों के साथ, यह निगरानी बढ़ गई है, जिसने गोपनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर, कौशिक बसु जैसे अर्थशास्त्री मानते हैं कि राष्ट्रीयकरण का मुख्य लक्ष्य समावेश था, और ग्रामीण भारत में बैंकिंग को लोकतांत्रिक बनाने में यह सफल रहा।

जन धन योजना की आवश्यकता

यदि राष्ट्रीयकरण इतना प्रभावी था, तो 2014 में मोदी सरकार को जन धन योजना (PMJDY) क्यों लानी पड़ी? 2011 की जनगणना के अनुसार, केवल 54.4% ग्रामीण परिवारों के पास बैंकिंग पहुंच थी। राष्ट्रीयकरण के बाद खुले कई खाते निष्क्रिय थे, क्योंकि वित्तीय साक्षरता और पहुंच सीमित थी। PMJDY ने डिजिटल तकनीक का उपयोग कर इस कमी को दूर किया। 2025 तक, इसने 53 करोड़ से अधिक खाते खोले, जिनमें से 67% ग्रामीण/अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं, और ₹2.3 लाख करोड़ से अधिक जमा हुए। जीरो-बैलेंस खातों, RuPay कार्ड, और ओवरड्राफ्ट सुविधा ने समावेश को गहरा किया, जो 1969 में संभव नहीं था।

शासन की चुनौतियां: कंपनी सेक्रेटरी की भूमिका

राष्ट्रीयकरण की तरह, सरकारी कंपनियां भी राज्य के नियंत्रण और समावेश के बीच संतुलन बनाती हैं। एक 100% सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी में, जो भूमि मुद्रीकरण में संलग्न है, कंपनी सेक्रेटरी को कॉर्पोरेट गवर्नेंस, कानूनी अनुपालन, और हितधारकों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी होती है। ऐसी कंपनियों में सरकार की नीतियां, जैसे वित्तीय समावेश को बढ़ावा देना, अक्सर प्राथमिकता होती हैं। लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप और नौकरशाही दबाव अनुपालन को जटिल बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, बोर्ड की मंजूरी के बिना नियुक्तियों को संभालना या वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जैसा कि राष्ट्रीयकृत बैंकों के अनुभव से देखा गया।

निष्कर्ष

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेश की नींव रखने में सफल रहा, लेकिन इसने सरकार को नागरिकों पर वित्तीय नियंत्रण का एक साधन भी दिया। अर्थशास्त्रियों के विचार बंटे हुए हैं—कुछ इसे समावेश का कदम मानते हैं, तो कुछ इसे नियंत्रण का उपकरण। PMJDY ने राष्ट्रीयकरण की कमियों को दूर करने का प्रयास किया, जो आधुनिक तकनीक के साथ समावेश को बढ़ाने में सफल रहा। लेकिन 2025 में भी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रभुत्व और सरकारी कंपनियों में शासन की चुनौतियां हमें वित्तीय स्वतंत्रता और राज्य की भूमिका पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं।

Comments

Leave a comment